Sunday, October 11, 2020

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                              चालाक सियार की कहानी

एक बार की बात है एक गांव में एक बैल रहता था। जिसको घूमना बहुत पसंद था। वह घूमता घूमता जंगल में जा पहुंचा और आते समय गांव का रास्ता भूल गया। वह चलता हुआ एक तालाब के पास पहुंचा।

जहाँ पर उसने पानी पिया और वहाँ की हरी हरी घास खायी। जिसको खाकर वह बहुत खुश हुआ और ऊपर मुँह करके चिल्लाने लगा। उसी समय जंगल का राजा शेर तालाब की ओर पानी पिने जा रहा था।

जब शेर ने बैल की भयानक आवाज़ सुनी तो उसने सोचा जरूर जंगल में कोई खतरनाक जानवर गया है। इसलिए शेर बिना पानी पिए ही अपनी गुफा की तरफ भागने लगा। शेर को इस तरह डर कर भागते हुए 2 सियार ने देख लिया।

वह शेर के मंत्री बनना चाहते थे। उनने सोचा यही सही समय है शेर का भरोसा जितने का। दोनों सियार शेर की गुफा में गए और बोले हमने आपको डर कर गुफा की ओर आते हुए देखा था। आप जिस आवाज़ से डर रहे थे वह एक बैल की थी।

यदि आप चाहे तो हम उसको लेकर आपके पास सकते है। शेर की आज्ञा से दोनों बैल को अपने साथ लेकर गए और शेर से मिलाया। कुछ समय बाद शेर और बैल बहुत ही अच्छे मित्र बन गए।

शेर ने बैल को अपना सलाहकार रख लिया। यह बात जानकर दोनों सियार उनकी दोस्ती से जलने लगे क्योकि उनने जो मंत्री बनने का सोचा था वह भी नहीं हुआ। दोनों सियार ने तरकीब निकाली और शेर के पास गए।

वह शेर से बोले बैल आपसे केवल मित्रता का दिखावा करता है। लेकिन हमने उसके मुँह से सुना है वह आपको अपने दोनों बड़े सींगो से मारकर जंगल का राजा बनना चाहता है। पहले तो शेर ने विश्वास नहीं किया लेकिन उसको ऐसा लगने लगा।

दोनों सियार इसके बाद बैल के पास गए। वह बैल से बोले शेर तुमसे केवल मित्रता का दिखावा करता है। मौका मिलने पर वह तुमको मार कर खा जायेगा। बैल को यह जानकर बहुत गुस्सा आया और वह शेर से मिलने के लिए जाने लगा।

सियार पहले ही शेर के पास जाकर बोले की बैल आपको मारने के लिए रहा है। बैल को गुस्से में आता देख शेर ने सियार की बात सच समझी और बैल पर हमला कर दिया। बैल ने भी शेर पर हमला किया और दोनों आपस में लड़ने लगे। अंत में शेर ने बैल को मार दिया और दोनों सियारों को अपना मंत्री बना लिया।

शिक्षा:-इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है की हमें कभी भी दूसरों के कहने पर अपनी मित्रता पर शक नहीं करना चाहिए। अच्छे मित्र बड़ी मुश्किल से मिलते है।

 

 

                                               चालाक कौआ की कहानी

 

बहुत समय पहले की बात है एक राजा के महल के बगीचे में एक कौआ अपनी बीवी के साथ रहता था। वह बगीचे के सबसे बड़े पेड़ पर रहते थे। उसी पेड़ के निचे एक अजगर का बिल था।

कौए को पता था की अजगर वही रहता है फिर भी वह उस पेड़ पर ही काफी समय से रहते थे। दोनों कौए सुबह के समय भोजन की तलाश में निकल जाते थे और शाम को खाना लेकर लौटते थे।

इसी तरह समय बीत रहा था। एक दिन मादा कौए ने दो अंडे दिए। दोनों बहुत खुश थे। अगले दिन दोनों कौए अंडो को घोसले में छोड़कर सुबह खाना ढूंढने चले गए।

शाम को वह खाना लेकर लौटे। आकर उनने देखा की अंडे वहाँ पर नहीं थे। इससे दोनों कौए बहुत दुखी हुए। इसके कुछ दिनों के बाद मादा कौए ने दोबारा अंडे दिए।

अगले दिन वह रोज़ की तरह खाने की तलाश में चले गए। उनके जाने के बाद अज़गर आया और पहले की तरह कौए के अंडे खा लिए।

जब शाम को कौए खाना लेकर लौटे। पेड़ पर लौटने के बाद उनने देखा की वहाँ से अंडे गायब थे। यह देखकर दोनों बहुत दुःखी हुए और रोने लगे।

लेकिन उनको अब समझ चूका था की यह जरूर पेड़ के नीचे रहने वाले अजगर का काम है। कौआ बहुत होशियार था उसने अजगर से छुटकारा पाने की सोची।

उसने एक दिन जब रानी तालाब में नहा रही थी। तब रानी का एक हार चुरा लिया। सैनिकों ने यह सब देख लिया। वह कौए के पीछे लग गए। कौए ने वह हार ले जाकर अजगर के बिल में डाल दिया।

जब सैनिक हार निकालने लगे तो उनको अज़गर दिखाई दिया। सेनिको ने अजगर को मार दिया और हार ले लिया। इस तरह कौए ने अजगर से छुटकारा पा लिया और दोनों खुशी से रहने लगे।

शिक्षा:-इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है की हम अपनी बुद्धिमानी से बड़ी से बड़ी मुसीबत से भी छुटकारा पा सकते है।

 

                                      दो बिल्लियां और एक बंदर की कहानी

बहुत समय पहले की बात है, एक गांव में 2 बिल्लियां रहती थीं. दोनों बहुत ही अच्छी दोस्त थीं और दोनों आपस में बहुत प्यार से रहती थीं. दोनों की दोस्ती का सभी लोग उदाहरण देते थे. वो दोनों बहुत ख़ुश थीं. उन्हें जो कुछ भी मिलता था, उसे आपस में मिल-बांटकर खाया करती थीं.

एक दिन दोनों दोपहर के व़क्त खेल रही थीं कि खेलते-खेलते दानों को ज़ोर की भूख लगी. वो भोजन की तलाश में निकल पड़ीं. कुछ दूर जाने पर एक बिल्ली को एक स्वादिष्ट रोटी नज़र आई. उसने झट से उस रोटी को उठा लिया और जैसे ही उसे खाने लगी, तो दूसरी बिल्ली ने कहा, अरे, यह क्या तुम अकेले ही रोटी खाने लगीं मुझे भूल गई क्या मैं तुम्हारी दोस्त हूं और हम जो भी खाते हैं आपस में बांटकर ही खाते हैं.

पहली बिल्ली ने रोटी के दो टुकड़े किए और दूसरी बिल्ली की ओर एक टुकड़ा बढ़ा दिया. यह देख दूसरी बिल्ली फिर बोली, “यह क्या, तुमने मुझे छोटा टुकड़ा दिया. यह तो ग़लत है.

बस, इसी बात पर दोनों में झगड़ा शुरू हो गया और झगड़ा इतना बढ़ गया कि सारे जानवर इकट्ठा हो गए. इतने में ही एक बंदर आया.
दोनों को झगड़ते देख वो बोला, अरे बिल्ली रानी, क्यो झगड़ा कर रही हो?”

दोनों ने अपनी दुविधा बंदर को बताई, तो बंदर ने कहा, “बस, इतनी सी बात. मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूं. मेरे पास एक तराज़ू है. उसमें मैं ये दोनों टुकड़े रखकर पता कर सकता हूं कि कौन-सा टुकड़ा बड़ा है और कौन-सा छोटा. फिर हम दोनों टुकड़ों को बराबर कर लेंगे. बोलो मंज़ूर

दोनों बिल्लियों को बंदर की बात जंच गई. वो तैयार हो गईं. बंदर पेड़ पर चढ़ा और तराज़ू ले आया. उसने दोनों टुकड़े एक-एक पलड़े में रख दिए. तोलते समय उसने देखा कि एक पलड़ा भारी था, तो वो बोला, “अरे, यह टुकड़ा बड़ा है, चलो दोनों को बराबर कर दूं और यह कहते ही उसने बड़े टुकड़े में से थोड़ा-सा तोड़कर खा लिया.

इस तरह से हर बार जो पलड़ा भारी हुआ, उस वाली तरफ़से उसने थोड़ी सी रोटी तोड़कर अपने मुंह में डालनी शुरू कर दी. दोनों बिल्लियां अब घबरा गईं. वो फिर भी चुपचाप बंदर के फैसले का इंतज़ार करती रहीं, लेकिन जब दोनों ने देखा कि दोनों टुकड़े बहुत छोटे-छोटे रह गए, तो वे बंदर से बोलीं, आप चिंता ना करो, अब हम लोग अपने आप रोटी का बंटवारा कर लेंगी.

इस बात पर बंदर बोला, जैसा आप दोनों को ठीक लगे, लेकिन मुझे भी अपनी मेहनत कि मज़दूरी तो मिलनी ही चाहिए ना, इतना कहकर बंदर ने रोटी के बचे हुए दोनों टुकड़े भी अपने मुंह में डाल लिए और बेचारी बिल्लियों को वहां से खाली हाथ ही लौटना पड़ा.

दोनों बिल्लियों को अपनी ग़लती का एहसास हो चुका था और उन्हें समझ में चुका था कि आपस की फूट बहुत बुरी होती है और दूसरे इसका फायदा उठा सकते हैं.

शिक्षा:-इस कहानी से यह सीख मिलती है कि कभी भी लालच नहीं करना चाहिए और कभी भी आपस में झगड़कर रिश्ते में फूट नहीं डालनी चाहिए, क्योंकि जब भी हम आपस में लड़ते हैं, तो कोई बाहरी व्यक्ति उसका फ़ायदा उठा जाता है, इसलिए एकता की शक्ति को पहचानें और मिलकर रहें.

 

 

                                 प्यासे कौवे की कहानी

 

एक बार की बात है किसी जंगल में एक कौवा था जो की वह कौआ बहुत प्यासा था। उसको कहीं पानी नहीं मिल रहा था। बहुत ढूँढने पर उसको एक घड़ा दिखाई दिया। घड़े में बहुत थोड़ा सा पानी था। लेकिन कौए की चोंच पानी तक नहीं पहुँच पा रही थी।

सामने पानी को देखकर कौवे की प्यास और भी बढ़ने लगी थी, फिर वह बड़े ध्यान से सोचने लगा और फिर उस कौवे को एक उपाय सूझा। उसने देखा की पास ही पत्थर के कुछ टुकड़े पड़े थे। कौए ने एक एक पत्थर उठाया और घड़े में डालता गया। धीरे धीरे पानी ऊपर आने लगा। कौआ लगातार पत्थर डालता गया। जल्दी ही पानी इतना ऊपर गया कि कौए की चोंच वहाँ तक आराम से पहुँच गई। और इस तरह तब कौए ने पानी पिया और अपनी प्यास बुझाई।

शिक्षा :- इस कहानी से हमे यही शिक्षा मिलती है की यदि परिस्थितिया चाहे कैसी भी हो लेकिन यदि हम सुझबुझ से काम ले तो निश्चित ही हम सभी विपत्ति से छुटकारा पा सकते है इसलिए हमे कभी भी अपना धैर्य नही खोना चाहिए.

                                    लालची चूहे की कहानी

एकबार एक लालची चूहे ने मकई से भरी टोकरी देखी। जिसे देखकर उसके मन में लालच गया और वह सभी मकई खाना चाहता था इसलिए उसने टोकरी में एक छोटा सा छेद बनाया। वह छेद के माध्यम से वह मकई के बोरे में नीचे घुस गया और जब तक उसका पेट खाली था तब तक उसने बहुत सारा मक्का खाया और बहुत खुश था। चुकी ढेर सारा मकई खाने के बाद उसका पेट भर चुका था तो अब वह बोरे से बाहर आना चाहता था। उसने छोटे छेद के माध्यम से बाहर आने की कोशिश की। लेकिन वह सफल नही हुआ क्योकि उसका पेट भरा हुआ था। और ऊपर से मकई के दानो से वह दब चुका था, फिर उसने कई कई बार कोशिश की। लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ। और अंत में चूहा रोने लगा। एक खरगोश पास से गुजर रहा था। इसने चूहे का रोना सुना और पूछा, “तुम रो क्यों रहे हो, मेरे दोस्त?”

चूहे ने समझाया, “मैंने इस बोरी में एक छोटा सा छेद बनाया और टोकरी में मकई खाने के लिए अंदर गया और अब मैं उस छेद से नहीं निकल पा रहा हूं।

तब खरगोश ने कहा, यह इसलिए है क्योंकि तुमने बहुत खाया। अपने पेट के सिकुड़ने तक प्रतीक्षा करें। खरगोश हँसा और चला गया। चूहा टोकरी में सो गया। अगली सुबह उसका पेट सिकुड़ गया था। लेकिन उसे फिर से भूख लग गयी थी फिर वह कुछ और मकई खाना चाहता था। भूख के मारे वह टोकरी से बाहर निकलने के बारे में सब भूल गया। इसलिए उसने मक्का खाया और उसका पेट फिर से बड़ा हो गया।

भरपेट खाने के बाद, चूहे को याद आया कि उसे बचना है। जिसके लिए उसे बोरे से बाहर निकलना है लेकिन पेट फूल जाने से फिर से वह बाहर नही जा सकता था तो उसने सोचा, ओह! अब मैं कल बाहर जाऊंगा।

फिर कुछ समय बाद वहा से एक बिल्ली गुजरी जिसे चूहे की सुगंध से वही रुक गयी और चूहे को मौका देखकर मार डाला। और फिर वही उस चूहे को चूहे को खा लिया। और इस प्रकार अत्यधिक लालच के चलते चूहा उस बोरे से बाहर भी नही निकल पाया और अपना जान भी गवा दिया.

शिक्षा :- लालची होना हमारा स्वाभाविक प्रकृति हो सकता है लेकिन कभी भी हमे लालच नही करना चाहिए क्युकी लालच हमेसा बुरी स्थिति ही लाती है जो की खुद के लिए मुसीबत का कारण बन जाता है इसलिए जैसा की कहा भी गया है लालच करना पाप है इसलिए इस कहानी से हमे यही शिक्षा मिलती है की कभी भी लालच नही करना चाहिए.

                                 ईमानदार रामलाल की कहानी

एक गांव में रामलाल नाम का एक व्यक्ति रहता था। वह घर को रंगने का काम करता था। वह अपना काम बड़ी ईमानदारी और मेहनत से करता था। मेहनत करने के बाद भी बहुत कम कमा पाता था।

जिससे की उसकी केवल दो समय की रोटी का जुगाड़ ही होता था। वह ज्यादा काम करना चाहता था। एक दिन गांव के जमींदार ने रामलाल को बुलाया। रामलाल जमींदार के पास गया।

जमींदार ने कहा की मेरे पास एक नांव है तुमको उस पर रंग करना है और उसको रंग आज के दिन ही करना है। रामलाल ने जमींदार को बोला की वह रंग कर देगा। जमींदार ने रामलाल से रंग करने का रेट पूछा तो रामलाल ने बोला की वह रंग करने का 1500 रूपए लेगा।

इसके बाद जमींदार ने रामलाल को नदी के किनारे खड़ी नाव दिखा दी। रामलाल अपने घर से रंग लाकर बड़ी सफाई के साथ उसमे रंग करने लगा। वह जब रंग कर रहा था तो उसको नाव में एक छेद नज़र आया।

उसने सोचा यदि मै इसके ऊपर केवल रंग कर दूंगा तो यह नाव डूब जाएगी। इसलिए पहले उसने उस छेद को भरा फिर उस पर रंग किया। नाव के रंग का काम पूरा होने पर वह जमींदार को नाव दिखाने लाया।

जमींदार ने नाव को देखने के बाद पैसे अगले दिन देने की बात की। जिसके बाद रामलाल चला गया। अगले दिन जमींदारके बीवी बच्चे उस नाव में बैठकर नदी के पार घूमने के लिए चले गए।

शाम को जब जमींदार का नौकर लौटा तो उसने घर के बाकी सदस्यों को घर में देखकर जमींदार से पूछा तो जमींदार ने बताया की वह नाव में बैठकर नदी के पार घूमने गए है। नौकर ने जमींदार को बताया की उस नाव में तो छेद था।

जमींदार इस बात से बहुत परेशान हो गया। इसके कुछ देर के बाद ही जमींदार की बीवी और बच्चे घर सकुशल लौट आये। उनको पता चल चूका था की रामलाल ने नाव में रंग करते समय उस छेद को भर दिया।

इसके बाद जब रामलाल अपने पैसे लेने आया तो जमींदार ने उसको पैसे दिए। रामलाल ने गिने तो उसमे 6000 रूपए थे। रामलाल ने कहा आपने गलती से मुझे ज़्यादा रूपए दे दिए है।

रामलाल ने कहा की नहीं यह तुम्हारे काम का इनाम है जो तुमने किया है। तुमने नाव में रंग करते समय जो छेद भरा था। उसकी वजह से मेरे परिवार की जान बच गयी। रामलाल पैसे लेकर घर चला गया। वह बहुत खुश था।

शिक्षा :- ईमानदारी और मेहनत से काम करने का नतीजा हमेशा अच्छा ही होता है।

कछुए और खरगोश की कहानी

एक वक्त की बात है, किसी घने जंगल में एक खरगोश रहता था, जिसे अपने तेज दौड़ने पर बहुत घमंड था। उसे जंगल में जो दिखता, वो उसी को अपने साथ दौड़ लगाने की चुनौती दे देता। दूसरे जानवरों के बीच वो हमेशा खुद की तारीफ करता और कई बार दूसरे का मजाक भी उड़ाता।

एक बार उसे एक कछुआ दिखा, उसकी सुस्त चाल को देखते हुए खरगोश ने कछुए को भी दौड़ लगाने की चुनौती दे दी। कछुए ने खरगोश की चुनौती मान ली और दौड़ लगाने के लिए तैयार हो गया।

जंगल के सभी जानवर कछुए और खरगोश की दौड़ देखने के लिए जमा हो गए। दौड़ शुरू हो गई और खरगोश तेजी से दौड़ने लगा और कछुआ अपनी धीमी चाल से आगे बढ़ने लगा। थोड़ी दूर पहुंचने के बाद खरगोश ने पीछे मुड़कर देखा, तो उसे कछुआ कहीं नहीं दिखा। खरगोश ने सोचा, कछुआ तो बहुत धीरे-धीरे चल रहा है और उसे यहां तक पहुंचने में काफी वक्त लग जाएगा, क्यों न थोड़ी देर आराम ही कर लिया जाए। यह सोचते हुए वह एक पेड़ के नीचे आराम करने लगा।

पेड़ के नीचे सुस्ताते-सुस्ताते कब उसकी आंख लग गई, उसे पता भी नहीं चला। उधर, कछुआ धीरे-धीरे और बिना रुके लक्ष्य तक पहुंच गया। उसकी जीत देखकर बाकी जानवरों ने तालियां बजानी शुरू कर दी। तालियों की आवाज सुनकर खरगोश की नींद खुल गई और वो दौड़कर जीत की रेखा तक पहुंचा, लेकिन कछुआ तो पहले ही जीत चुका था और खरगोश पछताता रह गया।

शिक्षा :- इस कहानी से यही सीख मिलती है कि जो धैर्य और मेहनत से काम करता है, उसकी जीत पक्की होती है और जिन्हें खुद पर या अपने किए हुए कार्य पर घमंड होता है, उसका घमंड कभी कभी टूटता जरूर है।

गौरैया और घमंडी हाथी की कहानी

एक पेड़ पर एक चिड़िया अपने पति के साथ रहा करती थी। चिड़िया सारा दिन अपने घोंसले में बैठकर अपने अंडे सेती रहती थी और उसका पति दोनों के लिए खाने का इंतजाम करता था। वो दोनों बहुत खुश थे और अंडे से बच्चों के निकलने का इंतजार कर रहे थे।

एक दिन चिड़िया का पति दाने की तलाश में अपने घोंसलें से दूर गया हुआ था और चिड़िया अपने अंडों की देखभाल कर रही थी। तभी वहां एक हाथी मदमस्त चाल चलते हुए आया और पेड़ की शाखाओं को तोड़ने लगा। हाथी ने चिड़िया का घोंसला गिरा दिया, जिससे उसके सारे अंडे फूट गए। चिड़िया को बहुत दुख हुआ। उसे हाथी पर बहुत गुस्सा आ रहा था। जब चिड़िया का पति वापस आया, तो उसने देखा कि चिड़िया हाथी द्वारा तोड़ी गई शाखा पर बैठी रो रही है। चिड़िया ने पूरी घटना अपने पति को बताई, जिसे सुनकर उसके पति को भी बहुत दुख हुआ। उन दोनों ने घमंडी हाथी को सबक सिखाने का निर्णय लिया।

वो दोनों अपने एक दोस्त कठफोड़वा के पास गए और उसे सारी बात बताई। कठफोड़वा बोला कि हाथी को सबक मिलना ही चाहिए। कठफोड़वा के दो दोस्त और थे, जिनमें से एक मधुमक्खी थी और एक मेंढक था। उन तीनों ने मिलकर हाथी को सबक सिखाने की योजना बनाई, जो चिड़िया को बहुत पसंद आई।

अपनी योजना के तहत सबसे पहले मधुमक्खी ने हाथी के कान में गुनगुनाना शुरू किया। हाथी जब मधुमक्खी की मधुर आवाज में खो गया, तो कठफोड़वे ने आकर हाथी की दोनों आखें फोड़ दी। हाथी दर्द के मारे चिल्लाने लगा और तभी मेंढक अपने परिवार के साथ आया और एक दलदल के पास टर्रटराने लगा। हाथी को लगा कि यहां पास में कोई तालाब होगा। वह पानी पीना चाहता था, इसलिए दलदल में जाकर फंसा। इस तरह चिड़िया ने मधुमक्खी, कठफोड़वा और मेंढक की मदद से हाथी से बदला ले लिया।

शिक्षा :- इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि एकता और विवेक का उपयोग करके बड़ी से बड़ी मुसीबत को हराया जा सकता है।

                                                शेर और सियार की कहानी 

एक बार की बात है सुंदरवन नाम के जंगल में बलवान शेर रहा करता था। शेर रोज शिकार करने के लिए नदी के किनारे जाया करता था। एक दिन जब नदी के किनारे से शेर लौट रहा था, तो उसे रास्ते में सियार दिखाई दिया। शेर जैसे ही सियार के पास पहुंचा, सियार शेर के कदमों में लेट गया।

शेर ने पूछा अरे भाई! तुम ये क्या कर रहे हो। सियार बोला, “आप बहुत महान हैं, आप जंगल के राजा हैं, मुझे अपना सेवक बना लीजिए। मैं पूरी लगन और निष्ठा से आपकी सेवा करूंगा। इसके बदले में आपके शिकार में से जो कुछ भी बचेगा मैं वो खा लिया करूंगा।”

शेर ने सियार की बात मान ली और उसे अपना सेवक बना लिया। अब शेर जब भी शिकार करने जाता, तब सियार भी उसके साथ चलता था। इस तरह साथ समय बिताने से दोनों के बीच बहुत अच्छी दोस्ती हो गई। सियार, शेर के शिकार का बचा खुचा मांस खाकर बलवान होता जा रहा था।

एक दिन सियार ने शेर से कहा, “अब तो मैं भी तुम्हारे बराबर ही बलवान हो गया हूं, इसलिए मैं आज हाथी पर वार करूंगा। जब वो मर जाएगा, तो मैं हाथी का मांस खाऊंगा। मेरे से जो मांस बच जाएगा, वो तुम खा लेना। शेर को लगा कि सियार दोस्ती में ऐसा मजाक कर रहा है,” लेकिन सियार को अपनी शक्ति पर कुछ ज्यादा ही घमंड हो चला था। सियार पेड़ पर चढ़कर बैठ गया और हाथी का इंतजार करने लगा। शेर को हाथी की ताकत का अंदाजा था, इसलिए उसने सियार को बहुत समझाया, लेकिन वो नहीं माना।

तभी उस पेड़ के नीचे से एक हाथी गुजरने लगा। सियार हाथी पर हमला करने के लिए उस पर कूद पड़ा, लेकिन सियार सही जगह छलांग नहीं लगा पाया और हाथी के पैरों में जा गिरा। हाथी ने जैसे ही पैर बढ़ाया वैसे ही सियार उसके उसके पैर के नीचे कुचला गया। इस तरह सियार ने अपने दोस्त शेर की बात न मानकर बहुत बड़ी गलती की और अपने प्राण गंवा दिए।

शिक्षा :- इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है हमें कभी भी किसी बात पर घमंड नहीं करना चाहिए और अपने सच्चे दोस्त को नीचा नहीं दिखाना चाहिए।

 

                                    बूढी औरत और कौआ की कहानी

बहुत समय पहले की बात है एक गांव में एक पीपल का पेड़ था। जिसमे बहुत सारे कौए रहते थे। एक दिन सुबह के समय सभी कौए रोज़ की तरह खाने की तलाश में पेड़ से चले गए। लेकिन एक कौआ सोया रहा।

जब वह उठा तो उसने देखा की सभी कौए जा चुके थे। इसके बाद उसने अकेले ही भोजन की तलाश करने के लिए जाने की सोची।

वह पेड़ से उड़ कर पुरे गांव में खाने की तलाश करने लगा। लेकिन उसको कहीं भी भोजन नज़र नहीं आया। इसके बाद वह एक घर की छत पर बैठ गया। उसको वहाँ बहुत ही अच्छी खुश्बू रही थी।

उसने जिस दिशा से खुश्बू रही थी। उस ओर जाने लगा। उसने देखा की एक बूढी औरत घर के आँगन में बैठ कर वड़ा बना रही थी। वड़ा को देखकर कौए के मुँह में पानी गया। उसको बहुत भूख लगी थी।

वह वड़ा तभी खाना चाहता था। जब वह नीचे उस बूढी औरत के पास गया तो उसने देखा की बूढी औरत ने एक कौए को पहले से बांध रखा है। बूढी औरत ने उस कौए को भी यही कहाँ की अगर तुमने वड़ा चुराने की कोशिश की तो तुमको भी इसकी तरह बांध दूंगी।

कौए को समझ गयी की जब तक बूढी औरत वहाँ पर है तब तक वह वड़ा नहीं चुरा सकता। उसने एक तरक़ीब सोची वह उस घर के पीछे गया और बच्चों की आवाज़ में बोला दादी कहाँ हो।

इसके बाद बूढी औरत बोली आती हूँ। जैसे ही बूढी औरत वहाँ से गयी कौए ने आकर एक वड़ा चुरा लिया और अपने पेड़ पर चला गया। जब वह अपने मुँह में वड़ा दबाएँ अपने घोंसले में पहुंचा तभी एक चालाक लोमड़ी में कौए को देख लिया।

वड़े को देखकर लोमड़ी के मुँह में पानी गया। उसने कौए की तारीफ करनी शुरू कर दी। वह बोला कितना अच्छा काले रंग का कौआ है। इसके पंख कितने अच्छे है। इसकी आँखे कितने अच्छी है।

अपनी तारीफ़ सुनकर कौआ बहुत खुश हुआ और सब कुछ भूल गया। इसके बाद लोमड़ी ने कहा ऐसे अच्छे कौए की आवाज़ भी जरूर अच्छी होगी। उसने कौए से कहा क्या तुम मुझको एक गाना सुनाओगे।

इसके बाद कौए ने जैसे ही अपना मुँह खोला वड़ा पेड़ से नीचे गिर गया। चालाक लोमड़ी ने वड़ा उठाया और वहाँ से चला गया।

कौए को पता चल चूका था की लोमड़ी ने उसको बेवकूफ बनाया है। उसने सोचा बूढी औरत से वड़ा चुराने की अब दूसरी तरक़ीब लगानी पड़ेगी।

 शिक्षा :- इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है की हमें झूठी तारीफ़ करने वालो से बचना चाहिए।

 

 

 

 

 

 

2 comments:

  1. Thank you so much to share with us. Really all are moral stories. It's very interesting stories for kids and teachers also.

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  2. Thank you so much for sharing with us these moral stories. It's really helpful for kids and teachers.

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