Thursday, October 8, 2020

Bhagavad Gita-भगवत गीता

 

भगवत गीता, भगवद गीता अध्याय, गीता के 18 अध्याय के नाम, गीता सार


 

कुरुक्षेत्र की (युद्ध/धूर्त)पृष्ठभूमि में ५००० वर्ष पूर्व भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिया जो श्रीमद्भगवदगीता के नाम से प्रसिद्ध है | यह कौरवों पांडवों के बीच युद्ध महाभारत के भीष्मपर्व का अंग है गीता में 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। संभवत: संसार का दूसरा कोई भी ग्रंथ कर्म के शास्त्र का प्रतिपादन इस सुंदरता, इस सूक्ष्मता और निष्पक्षता से नहीं करता। इस दृष्टि से गीता अद्भुत मानवीय शास्त्र है। इसकी दृष्टि एकांगी नहीं, सर्वांगपूर्ण है। गीता में दर्शन का प्रतिपादन करते हुए भी जो साहित्य का आनंद है वह इसकी अतिरिक्त विशेषता है। तत्वज्ञान का सुसंस्कृत काव्यशैली के द्वारा वर्णन गीता का निजी सौरभ है जो किसी भी सहृदय को मुग्ध किए बिना नहीं रहता। इसीलिए इसका नाम भगवद्गीता पड़ा, भगवान् का गाया हुआ ज्ञान।

भगवत गीता किसने लिखी:-

महर्षि कृष्ण दैपायन व्यास ने  गीता को लिखा है। भगवत गीता महाभारत का ही एक भाग है, जहाँ भगवान कृष्ण, अर्जुन को गीता का उपदेश देते है।

भगवत गीता में कितने श्लोक है

श्रीमद भगवत गीता के 18 अध्याय और 700 गीता श्लोक में कर्म, धर्म, कर्मफल,

आदि जीवन से जुड़े प्रश्नों के उत्तर मौजूद हैं।

भगवद गीता अध्याय :-

श्रीमद भगवत गीता के श्लोक में मनुष्य जीवन की हर समस्या का हल छिपा है। गीता में 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं।


गीता के 18 अध्याय के नाम:-

1.पहला अध्याय का नाम अर्जुनविषादयोग है।

 

2.दूसरा अध्याय का नाम सांख्ययोग है।

 

3.तीसरा अध्याय का नाम कर्मयोग है।

 

4.चौथा अध्याय का नाम ज्ञानकर्मसंन्यासयोग है।

 

5.पांचवां अध्याय का नाम कर्मसंन्यासयोग है।

 

6.छठा अध्याय का नाम आत्मसंयमयोग  है।

 

7.सातवां अध्याय का नाम ज्ञानविज्ञानयोग है।

 

8.आठवां अध्याय का नाम अक्षरब्रह्मयोग है।

 

9. नौवां अध्याय का नाम राजविद्याराजगुह्ययोग है।

 

10.दसवां अध्याय का नाम विभूतियोग है।

 

11.ग्यारहवां अध्याय का नाम विश्वरूपदर्शनयोग है।

 

12.बारहवां अध्याय का नाम भक्तियोग है।

 

13.तेरहवां अध्याय का नाम क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग है।

 

14.चौदहवां अध्याय का नाम गुणत्रयविभागयोग है।

 

15.पंद्रहवां अध्याय का नाम पुरुषोत्तमयोग है।

 

16.सोलहवां अध्याय का नाम दैवासुरसम्पद्विभागयोग है।

 

17.सत्रहवां अध्याय का नाम श्रद्धात्रयविभागयोग है।

 

18.अठारहवां अध्याय का नाम मोक्षसंन्यासयोग है।

गीता सार– Geeta Saar

क्यों व्यर्थ की चिंता करते हो? किससे व्यर्थ डरते हो? कौन तुम्हें मार सकता है? आत्मा ना पैदा होती है, मरती है।

जो हुआ, वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है, जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा। तुम भूत का पश्चाताप करो। भविष्य की चिन्ता करो। वर्तमान चल रहा है।

तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो? तुम क्या लाए थे, जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था, जो नाश हो गया? तुम कुछ लेकर आए, जो लिया यहीं से लिया। जो दिया, यहीं पर दिया। जो लिया, इसी (भगवान) से लिया। जो दिया, इसी को दिया।

खाली हाथ आए और खाली हाथ चले। जो आज तुम्हारा है, कल और किसी का था, परसों किसी और का होगा। तुम इसे अपना समझ कर मग्न हो रहे हो। बस यही प्रसन्नता तुम्हारे दु:खों का कारण है।

परिवर्तन संसार का नियम है। जिसे तुम मृत्यु समझते हो, वही तो जीवन है। एक क्षण में तुम करोड़ों के स्वामी बन जाते हो, दूसरे ही क्षण में तुम दरिद्र हो जाते हो। मेरा-तेरा, छोटा-बड़ा, अपना-पराया, मन से मिटा दो, फिर सब तुम्हारा है, तुम सबके हो।

यह शरीर तुम्हारा है, तुम शरीर के हो। यह अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश से बना है और इसी में मिल जायेगा। परन्तु आत्मा स्थिर हैफिर तुम क्या हो?

तुम अपने आपको भगवान को अर्पित करो। यही सबसे उत्तम सहारा है। जो इसके सहारे को जानता है वह भय, चिन्ता, शोक से सर्वदा मुक्त है।

जो कुछ भी तू करता है, उसे भगवान को अर्पण करता चल। ऐसा करने से सदा जीवन-मुक्त का आनंन्द अनुभव करेगा।